अध्याय 13
Reprint 2025-26
हिंदी साहित्य में रवींद्र केलेकर जी की रचना "गिन्नी का सोना और झेन की देन" अपनी गहन दार्शनिकता और सरल प्रस्तुति के लिए जानी जाती है। यह रचना हमारे जीवन मूल्यों और जीवन जीने के तरीकों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है।
इस इंटरैक्टिव पाठ में हम रवींद्र केलेकर के जीवन, उनके लेखन और इस पाठ में वर्णित दो महत्वपूर्ण प्रसंगों का विस्तृत अध्ययन करेंगे। इन दो प्रसंगों के माध्यम से हम आदर्शवादिता, व्यावहारिकता और वर्तमान क्षण के महत्व को समझेंगे।
" ऐसा माना जाता है कि थोड़े में बहुत कुछ कह देना कविता का गुण है। जब कभी यह गुण किसी गद्य रचना में भी दिखाईं देता है तब उसे पढ़ने वाले को यह मुहावरा याद नहीं रखना पड़ता कि 'सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उडाय'। सरल लिखना, थोड़े शब्दों में लिखना ज्यादा कठिन काम है। फिर भी यह काम होता रहा है। सूक्त कथाएँ, आगम कथाएँ. जातक कथाएँ. पंचत्र की कहानियाँ उसी लेखन के प्रमाण हैं। यही काम कोंकणी में खींर केलेकर ने किया है।
प्रसतुत पाठ के प्रसंग पढ़ने वालों से थोड़ा कहा बहत समझना की माँग करते हैं। ये प्रसंग महज पढ़ने-गुनने की नहीं, एक जागरूक और सक्रिय नागरिक बनने की प्रेणा भी देते हैं। पहला प्रसंग गिन्नी का सोना जीवन में अपने लिए सुख -साधन 'जुटाने वालों से नहीं बल्कि उन लोगों से परिचित कराता है जो इस जगत को जीने और रहने योग्य बनाए हए हैं।
दूसरा प्रसंग झेन की देन बौद्ध दर्शन में वर्णित ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है जिसके कारंण जापान के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिनच्या के बीच कुछ चैन भरेपलपा जाते हैं।"
पाठ में प्रयुक्त शब्दों के पर्याय जानिए:
"व्यावहारिकता" का पर्याय है
"शाश्वत" का पर्याय है
"विलक्षण" का पर्याय है
"सूझबूझ" का पर्याय है
"सन्नाटा" का पर्याय है
'लाभ-हानि' का विग्रह इस प्रकार होगा- लाभ और हानि। यहाँ द्वंद्व समास है जिसमें दोनों पद प्रधान होते हैं। दोनों पदों के बीच योजक शब्द का लोप करने के लिए योजक चिह्न लगाया जाता है।
निम्नलिखित द्वंद्व समास का विग्रह कीजिए:
माता-पिता:
पाप-पुण्य:
सुख-दुख:
घर-बाहर:
नीचे दिए गए विशेषण शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाइए:
1. सफल
2. विलक्षण
3. आदर्शवादी
4. शुद्ध
निम्नलिखित वाक्यांश के आशय पर चिंतन कीजिए और अपना विचार व्यक्त कीजिए:
निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर अपने विचार व्यक्त कीजिए:
" रवींद्र केलेकर (1925-2010)
7 मार्च 1925 को कोंकण क्ेतर में जन्मे रींदर केलेकर छात्र जीवन से ही गोवा मुकित आंदोलन में शामिल हो गए थे। गांधीवादी चितक के रूप में विख्यात 'केलेकर ने अपने लेखन में जन-जीवन के विविध पक्षों, मान्यताओं और व्यक्तिगत विचारं को देश और समाज के परिप्रेष्य में प्रस्ुत किया है। इनकी अनुभवजन्य टिप्पणियों में अपने चिंतन की मौलिकता के साथ ही मानवीय सत्य तक पहँचने की सहज चेष्टा रहती है।
कोंकणी और मराठी के शीर्षस्थ लेखक और पत्रकार रवं्र केलेकर की कोंकणी में पच्चीस, मराठी में तीन, हंदी और गुजराती में भी कुछेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। केलेकर ने काका कालेलकर की अनेक पुस्तकों का संपादन और अनुबाद भी किया है।
गोवा कला अकादमी के साहित्य पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित केलेकर की प्रमुख कृतियाँ हैं-कोंकणी में उजवाढाचे सूर, समिधा, संगली ओथांबे; मराठी में कोंकणीचें राजकरण, जापान जसा दिसला और हिंी में पतझर में टूटी पत्तियाँ | "
जापान में 'झेन बुद्धिज्म' एक महत्वपूर्ण दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपरा है, जो वर्तमान क्षण में जीने और चेतना के विकास पर केंद्रित है। जापानी चाय समारोह (चा-नो-यू) इसी परंपरा का एक हिस्सा है, जो शांति, सौंदर्य और क्षणिकता की सराहना पर आधारित है।